Sharad Sharma, Reporter, NDTV

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Friday, 28 March 2014

केजरीवाल को लेकर क्या सोचती है आम जनता?


लोकसभा चुनाव 2014 के सिलसिले में मैं दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में घूमता रहा और हाल ही में बनारस गया था। जिस ट्रेन से मैं दिल्ली से बनारस जा रहा था, उसी से अरविंद केजरीवाल भी जा रहे थे - बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान करने।
ट्रेन में बहुत-से लोग आकर अरविंद केजरीवाल से मिले, और वे सब आम लोग ही थे। कोई उन्हें शुभकामना दे रहा था, कोई कह रहा था कि 'आप संघर्ष करें, हम आपके साथ हैं...' लेकिन इन सबके बीच बड़ी संख्या में लोग केजरीवाल के पास आकर यह भी कह रहे थे कि वे केजरीवाल के फैन रहे हैं और अभी तक तो केजरीवाल के समर्थक थे या फिर उन्होंने दिल्ली में 'आप' को वोट डाला था, लेकिन जिस तरह केजरीवाल सरकार ने इस्तीफा दिया, उससे उनके मन में कुछ शक पैदा हुआ है।

इस बात को समझने की ज़रूरत है कि अगर लोग केजरीवाल के मुंह पर यह बोल रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि आम आदमी पार्टी से उनका मोहभंग होता दिख रहा है। केजरीवाल ने ज़्यादातर लोगों के सवालों के जवाब देने को कोशिश की, लेकिन फिर मुझे याद आया कि मैं दिल्ली में जितनी भी जगह पर घूम रहा हूं, वहां भी आम आदमी पार्टी के लिए चिंता की बात यह है कि उनके लिए कुछ हद तक लोगों में नाराज़गी दिखाई दे रही है। नाराज़गी इस बात की कि उन्होंने 49 दिन में सरकार क्यों गिराई और छोड़कर भाग क्यों गए...?

बेशक आम आदमी पार्टी इसके लिए दलीलें दे रही है और बता रही है कि उन्होंने कुर्बानी दी है, त्याग किया है और कहीं छोड़कर नहीं भागे हैं, फिर लौटकर आएंगे, लेकिन आम जनता की समस्या दूसरी है और बेहद वाजिब है। सरकार के न रहने से अब सारे काम रुक गए हैं, और लोग अपनी समस्या लेकर किसके पास जाएं...? जो बिजली बिल कम किए जाने का वादा था, वह तक अधूरा रह गया है। जिन लोगों ने केजरीवाल के कहने पर बिल नहीं दिए, उन पर सारे बिल एक साथ देने का दबाव अलग से है।

अफसर तो वैसे भी कभी जनता के काम में दिलचस्पी नहीं दिखाते थे, तो अब राष्ट्रपति शासन में नौकरशाही किस आम आदमी का दर्द समझती होगी...?

विधायकों के पास जाते भी हैं तो विधायकों के काम करने की एक सीमा होती है। जब तक केजरीवाल मुख्यमंत्री थे, विधायकों के कहने पर बहुत-से ऐसे काम हो जाया करते थे, जो उनके अधिकार क्षेत्र में तो नहीं आते थे, लेकिन आम जनता की सहूलियत के होते थे। लेकिन जब सरकार ही नहीं रही तो विधायक की ताकत भी जैसे चली गई, जबकि उस पर जनता की उम्मीदों का दबाव इतना ज़्यादा है, इसको कैसे संभालें, कुछ पता नहीं। इन नौजवान नेताओं को वैसे भी ज़्यादा अनुभव नहीं था, ऐसे हालात से निपटने का। इस कारण आम आदमी पार्टी के लिए इन दिनों सबसे बड़ी नकारात्मकता इसी को लेकर है।
जब मैंने अरविंद केजरीवाल से इसको लेकर सवाल किया तो उन्होंने इसका दोष कांग्रेस और बीजेपी पर डाल दिया। शायद इसलिए, क्योंकि जो चाल केजरीवाल चल चुके हैं, अब उसको वापस लेने का कोई जरिया नहीं है। लेकिन इसका एक मतलब यह भी है कि केजरीवाल अपनी रणनीति को लेकर ऐसे संशयविहीन हो चुके हैं कि वह दूसरों की प्रतिक्रियाओं से बेपरवाह नज़र आते हैं। इससे यह ख़तरा दिखाई देता है कि 'आप' आलोचनाओं को नज़रअंदाज़ करने लगी है।

हालांकि केजरीवाल का मूल आधार अब भी बचा हुआ है, और उन्हें आज भी जनता ईमानदार मानती है। उनकी अपनी छवि ऐसी 'टैफलॉन कोटिंग' वाली है, जिस पर करप्शन जैसा कोई आरोप चिपक नहीं पाता। यही नहीं, जहां तक मैं दिल्ली घूमा, लोगों ने मुझे बताया कि यह बात सच है कि जब केजरीवाल की सरकार थी, तब भ्रष्टाचार घटा था।

व्यापारी, ऑटो, टैम्पो ड्राइवर - सबका अनुभव यही था कि पुलिस उनसे उगाही से बचने लगी थी, इसलिए अब चुनाव होंगे तो वे फिर केजरीवाल को वोट देंगे। और एक धारणा दिल्ली के आम लोगों में यह भी दिख रही है कि लोकसभा चुनाव 2014 में वे मोदी को समर्थन दें और जब दोबारा दिल्ली में चुनाव हों तो फिर केजरीवाल को वोट दें।
थोड़ी और पड़ताल की कोशिश की तो समझ में आया कि दिल्ली में जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा तबका है, वह आम आदमी पार्टी का ऐसा मज़बूत हिस्सा है, जिस पर केजरीवाल का असर अब भी बना हुआ है। याद रखना ज़रूरी है कि यह तबका कल तक कांग्रेस का वोटबैंक था, जो आज आम आदमी पार्टी का बन चुका है। लेकिन मिडिल क्लास और अपर मिडिल क्लास में 'आप' को लेकर नाराज़गी है। आम आदमी पार्टी के काम करने के तरीके को लेकर यहां वोटों में सेंध लग सकती है।

लेकिन जानकार यह भी मान रहे हैं कि आम आदमी पार्टी इस सेंधमारी की भरपाई मुस्लिम वोटों से कर सकती है, क्योंकि केजरीवाल मोदी के खिलाफ झंडा बुलंद किए हुए हैं और दिल्ली में कांग्रेस तीसरे नंबर पर दिख रही है। ऐसे में मुसलमान इस बार आम आदमी पार्टी की तरफ जा सकते हैं। दिसंबर, 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 34 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि आम आदमी पार्टी को करीब 30 फीसदी, लेकिन इसमें ज़्यादा मुस्लिम वोट नहीं थे। कांग्रेस को 25 प्रतिशत वोट मिले थे और उसके आठ में से चार विधायक मुसलमान हैं।

जानकार यह भी मान रहे हैं कि जिस तरह से केजरीवाल ने सरकार में रहते हुए वर्ष 1984 में हुए सिख विरोधी हिंसा के लिए विशेष जांच दल बनाने का ऐलान किया, उससे सिखों में भी आम आदमी पार्टी की साख बढ़ी है। वैसे सिख-बहुल सीटों से 'आप' को पहले भी अच्छा सपोर्ट मिला था और तीन सिख विधायक जीतकर आए थे।

लेकिन यह अभी का माहौल है। 31 मार्च से केजरीवाल वापस दिल्ली में प्रचार के लिए उतरेंगे और रोज़ एक लोकसभा क्षेत्र में रोड शो और जनसभा करेंगे। आम आदमी पार्टी को इससे सबसे ज़्यादा उम्मीद है, क्योंकि नवंबर में रोड शो करके ही केजरीवाल ने पार्टी के लिए माहौल बनाया था और इस बार भी वह कोशिश करेंगे कि आम जनता को अपने जवाबों से संतुष्ट करें। दिल्ली में 10 अप्रैल को वोट है...

 

Sunday, 16 March 2014

मुख्यमंत्री और दिल्ली

कहाँ जा रहे हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री ?


दिल्ली का भी क्या नसीब है
जब तक मुख्यमंत्री थी तो 15 साल से ऐसे ऐसे जमी हुई थी जैसे फेविकोल का मज़बूत हो जो टूटता नहीं दिखा
लेकिन 2013 के चुनाव के बाद से दिल्ली का नसीब ही बदल गया
सबसे पहले तो आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल ने शीला दीक्षित को उनके घर में घुसकर करारी शिकस्त
उसके बाद उनपर भ्रष्टाचार के मामलों में FIR दर्ज करवा दी
15 साल से दिल्ली 
की  गद्दी पर आसीन थी शीला दीक्षित
लेकिन अरविन्द केजरीवाल के हाथों मिली एक हार ने उनका राजनैतिक भविष्य ही ख़तम कर दिया
आखिर उनको केरल का राज्यपाल बनाकर दिल्ली को अलविदा कहना पड़ा
किसी ने सोचा न था कि दिल्ली पर राज करने वाली मुख्यमंत्री को ऐसे दिल्ली छोड़ना होगा


अब बात करिये अरविन्द केजरीवाल की
जो देश के इतिहास के इतिहास के पहले ऐसे मुख्यमंत्री बने
जो बने नहीं बल्कि बनवाये गए, केजरीवाल बोले कि मैं नहीं बनता
लेकिन कांग्रेस और बीजेपी बोले कि कैसे नहीं बनेगा, तू ही बनेगा मुख्यमंत्री
लिहाज़ा अरविन्द केजरीवाल 28 दिसंबर को दिल्ली के 7वे मुख्यकमंत्री बन गए
लेकिन उनकी रफ़्तार इतनी ज़यादा थी कि 14 फरवरी को सरकार से इस्तीफा देकर चल दिए
और अब नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने बनारस कि और कूच करने वाले हैं
यानि दिल्ली के ये भी मुख्यमंत्री से दिल्ली से जा रहे हैं


और अब बात करिये उस शख्स की दिल्ली के अंदर 20 साल पहले मंत्री बना था
दिल्ली में बीजेपी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार भी था
दिल्ली में बीजेपी सबसे ज़यादा सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी उसके नेतृत्व में बनी
लेकिन उसकी किस्मत देखो वो मुख्यमंत्री नहीं बन पाया
डॉ  हर्षवर्धन एक साफ़ छवि और शांत स्वभाव वाले व्यक्ति माने जाते हैं
अरविन्द केजरीवाल के इस्तीफ़ा देने के बाद माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव में NDA
कि सरकार अगर बन जाती है तो दिल्ली में 2-4 विधायक इधर उधर से तोड़कर डॉ  हर्षवर्धन
दिल्ली के मुख्यमंत्री बन सकते हैं लेकिन शनिवार रात को इस अटकल पर पानी फिरता दिखा
बीजेपी ने डॉ साहब को चांदनी चौक से उम्मीदवार बनाया है
यानि अब वो भी दिल्ली कि राजनीती से केंद्र कि राजनीती कि और बढ़ा चुके हैं

अब ज़रा दिल्ली के इन तीन मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री उम्मीदवार या भावी मुख्यमंत्री को फिर से देखें जो असल में दिल्ली का चेहरा हैं

शीला दीक्षित - राज्यपाल बनकर जा चुकी हैं , उम्र भी बहुत हो चुकी है , कांग्रेस की दिल्ली में अभी वापसी में समय लगेगा और वापसी हो भी जाए तब भी  शीला दीक्षित की  कहानी कम से कम दिल्ली की राजनीती में मुश्किल लगती है

डॉ हर्षवर्धन - चांदनी चौक से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं , जीत गए तो संसद में जायेंगे और हो सकता है कि केंद्र के मंत्री भी बन जाएँ (सारे ओपिनियन पोल NDA को बढ़त दिखा रहे हैं और हर्षवर्धन दिल्ली और बीजेपी के पुराने और वरिष्ठ  नेता हैं) और उसके बाद बीजेपी कोई और चेहरा तलाशेगी दिल्ली के लिए , लेकिन अगर हार गए मुझे इस बात पर शक़ है कि वो मुख्यमंत्री उम्मीदवार रह पाएंगे क्योंकि हारने के बाद उनके विरोधी सक्रिय होकर उनके नेतृत्व पर ये कहकर सवाल उठा सकते हैं कि जो मोदीजी कि हवा होने के बाद भी नहीं जीत सका वो नेता कैसा ?
यहाँ बीजेपी के साथ समस्या ये है कि उसके पास दावेदार बहुत हैं चाहे वो मुख्यमंत्री पद हो या संसद और विधायक का टिकट

अरविन्द केजरीवाल - मोदी से लड़ने दिल्ली छोड़कर बनारस जा रहे हैं, राजनीति और बनारस को समझने वाले ये तो मान रहे हैं कि टक्कर अच्छी हो सकती है लेकिन ये नहीं मान रहे कि केजरीवाल जीत सकते हैं , चलिए फिर भी एक बार को मानकर चलते हैं कि केजरीवाल बनारस से जीत गए तो भी क्या? वो संसद में क्या करेंगे, सरकार तो बननी नही हैं अपने दम पर और पार्टी गठबंधन की राजनीती का विरोध अभी तक करती आयी है (कल क्या हो कौन जानता है ?, राजनीति तो वक़्त और हालत के हिसाब से पहली भी बदली है और आगे भी बदल सकती है) और अगर ये मान लेते हैं कि किसी का समर्थन करके सरकार बनवा देती है आम आदमी पार्टी तो भी केजरीवाल संसद में में क्या करेंगे , वो वापस दिल्ली ही आयेंगे …… और मान लो कि केजरीवाल हार गए तो भी वो वापस दिल्ली ही आयेंगे और दोबारा चुनाव कि सूरत में फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की  दावेदारी करेंगे

अब ये तो मेरा अपना आंकलन है बाकी तो आप लोग और जनता ज़यादा जानती है, और हाँ अगर कुछ स्थिति और बनी या हालत बदले तो मैं लिखने के लिए फिर आउंगा

Saturday, 15 March 2014

मीडिया पर महाभारत

 मीडिया पर महाभारत

सोशल मीडिया नाम की रणभूमि-ए -कुरुक्षेत्र  में दो सेनाएं हैं
एक तो है मोदी सेना और दूसरी है केजरीवाल सेना
ये दोनों ही सेनाएं इस समय राष्ट्रवाद का झंडा उठायें हुए हैं
दोनों ही देश में परिवर्तन और बदलाव कि बयार बहाने में लगे हैं
इन दोनों के मुदद्दे भी असल में एक से ही हैं
जैसे कि करप्शन हटाओ , वंशवाद हटाओ देश बचाओ देश बचाओ
पर मोदी सेना कहती है कांग्रेस हटाओ देश बचाओ
और केजरीवाल सेना कहती है कांग्रेस-बीजेपी दोनों हटाओ और देश बचाओ
मुद्दे इन दोनों के भले एक से दिखते हो लेकिन ये कभी एक दूसरे से सहमत नहीं हो सकते
इन दोनों का एक बहुत बड़ा और प्रिय मुद्दा है
'पेड मीडिया', दोनों का ही ये आरोप सदा रहता है कि मीडिया हमको नहीं दिखा रहा
मोदी सेना कि शिकायत कि मीडिया राहुल गांधी और केजरीवाल को इतना दिखा रहा है लेकिन हमारे मोदीजी को नहीं
और केजरीवाल सेना कहती है मोदी और राहुल कि रैली इतनी दिखाई जा रही है हमारे लेकिन केजरीवाल की नहीं
अब सवाल ये है कि ये दोनों एक साथ सही कैसे हो सकते हैं ?
इस बीच अब राहुल सेना भी धीरे धीरे नज़र आ रही है हालांकि सोशल मीडिया नाम के इस कुरुक्षेत्र में
उनकी सेना कि मौजूदगी ऐसी है जैसे कोई सेनापति अपनी एक छोटी सी टुकड़ी को अपने दुश्मन कि हलचल पर नज़र के लिए भेजता है
लेकिन इस रणभूमि के बाहर बहुत से कांग्रेसी नेता मीडिया से गज़ब किलसे हुए हैं
उनकी भी शिकायत है कि आप बस मोदी और केजरीवाल ही दिखा रहे हो देश की सबसे पुरानी पार्टी को आप नज़रअंदाज़ कैसे कर सकते हैं ?
उनके मुताबिक़ भी मीडिया बिका हुआ है और कांग्रेस विरोधी एजेंडा पर लगा हु आ है
ये तीन ही नहीं हैं , उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की राय भी इससे कुछ ख़ास अलग है क्या?
और हाँ सालों से देश में संघर्ष कर रहे लाल सलाम वाले वाम दल वालों से भी ज़रा पूछ लो उनकी राय क्या है इस बारे में ..... ज़यादा अलग नहीं मिलेगी
अब सवाल ये है कि इतने सारे लोग एक साथ सही कैसे हो सकते हैं

यहाँ एक किस्सा याद आया जो फिट बैठता है इस मौके पर
एक दफा मायावती जब उत्तर प्रदेश कि मुख्यमंत्री थी तो नॉएडा एक कार्यक्रम में आयी
शायद उनके महत्वाकांक्षी मूर्ति वाले का कोई शिलान्यास या उदघाटन रहा होगा
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के लिए नॉएडा आना शायद शुभ नहीं माना जाता
मुलायम सिंह यादव इससे पहले मुख्यमंत्री रहे लेकिन नहीं कभी नॉएडा
इसलिए जब बहनजी आयी तो टीवी चैनल्स ने उनको अच्छे से कवर किया चर्चा के लिए राजनैतिक मेहमान भी बुलाये
चर्चा मायावती के बोलने के बाद होनी थी एक न्यूज़ चैनल पर लेकिन मायावती ने तय वक़्त के बाद भाषण दिया
जिससे कि स्टूडियो में बैठे मेहमान को ज़यादा इंतज़ार करना पड़ा
तो भाषण के बाद जैसे ही चर्चा शुरू हुई तो एक पॉलिटिकल पार्टी के प्रवता ने कहा
''मैं पहली बार देख रहा हूँ कि एक मुख्यमंत्री को एक नेशनल न्यूज़ चैनल में इतना समय देकर लाइव दिखाया जा रहा है ''
एंकर भी बड़ा नामी और ज्ञानी था उसने भी तपाक से जवाब दिया
''ये वही न्यूज़ चैनल्स हैं जो एक राष्ट्रीय पार्टी के महासचिव को कवर करने मीलों दूर तक अपनी ओबी वैन उसके पीछे लगा देते हैं ''
उम्मीद है आप समझ गए होंगे कि ये किस्सा क्या है
नहीं भी समझे तो कोई बात नहीं , आपको मेरी बात वैसे तो समझ आ ही गयी होगी

यहाँ मैं ये ज़रूर कहना चाहुंगा कि मैं किसी बात को या किसी आरोप को नकार नहीं रहा
हर समाज में सही और गलत , अच्छा और बुरा , ईमानदार और बेईमान दोनों तरह के लोग होते हैं
बल्कि मैं तो यहाँ तक कहना चाहूंगा कि मीडिया में जितनी बड़ी समस्या होने के आरोप लग रहे हैं
समस्या उससे ज़यादा गम्भीर है, आरोप तो केवल आसानी से सरलता से ये लग रहे है ना कि मीडिया बिकाऊ है
ठीक है इस बात की जांच से मना कौन कर रहा है ?
लेकिन इस बात को समझिये कि जनता कि नज़र में मीडिया 'मीडिया ' ही होता है
एक दो या चार चैनल नहीं , बड़े शहर में रहने वाले तो अलग अलग अखबारों या चैनल में फर्क कर लेते हैं
लेकिन छोटे शहरों और क़स्बों में रहना वाला आदमी इतनी गहराई में नहीं जाता
उसके लिए तो पूरा मीडिया एक ही होता है
उसको ही नेता डिस्क्रेडिट कर देंगे तो उन ईमानदारों का क्या होगा जो पत्रकारिता के माध्यम से देश के असल मुद्दे उठा रहे हैं ?


समस्या जो आपको दिख रही है केवल वो ही नहीं है
समस्या ये भी ये भी है कि दूर दराज में फैले स्ट्रिंगर्स की हालत क्या है?
मीडिया में पिछले दिनों में लगातार हो रही छंटनी पर कितनों का आक्रोश फूटा ?
एक मीडिया हाउस कितने राज्यों में अपना 'एक' ऑफिस चला पा रहा है?

मैं ये भी मानता हूँ कि देश में लोग मीडिया से नाराज़ हैं
मानता हूँ कि मीडिया का काम करने का तरीका ऐसा रहा कि आम जनता नाराज़ ही होगी
हम ऐसी कितनी खबरें करते हैं हैं जिसका सीधा फायदा आम जनता या आम आदमी को मिलता होगा
ऐसा हम कितनी बार करते हैं कि एक आम अनजान आदमी ने हमसे मदद मांगी और हम कर पाये
देश में जनता मीडिया से इतनी नाराज़ क्यूँ है कि जब जब कोई नेता मीडिया
 का मज़ाक बनाता या हमला करता है तो पब्लिक खुश होकर तालियां पिटती है

असल में बात ये है कि आज़ादी के बाद से अब तक ना तो नेता ने जनता की कोई सुनी
ना ही कोई सरकारी दफ्तर में बैठे अधिकारियों या बाबुओं ने
किसी गरीब के साथ कोई घटना हो जाए तो थाने में जाकर उसके साथ ऐसा सलूक होता हैं जैसे वो 'झूठ' बोलने थाने आया हो
और अदालतों के चक्कर में पड़कर तो ज़माने गुज़र जाते हैं लेकिन इन्साफ नहीं मिलता , मिलती है तो सिर्फ तारीख

अब ये लोकतंत्र के तीन खम्बे तो हो गए लोकतंत्र का चौथा खम्बा क्या करता रहा है ये तो हम देख ही रहे हैं
हम आम जनता कि कितनी बात सुन पा रहे हैं दिल पे हाथ रखकर सोचिये

समस्याओं से कौन इनकार कर रहा है
लेकिन इस सबके बावजूद मैं मानता हूँ कि समय समय पर मीडिया  ने बहुत से सकारात्मक काम भी किए
ऐसे काम किये जिससे लोकतंत्र मज़बूत हुआ, कमज़ोर को ताक़त दी , बलवान पर कड़ी नज़र रखी

आलोचना कीजिये खूब जमकर कीजिये लेकिन भाषा और शब्दों का चयन भी अच्छा रखें
कृपया सिस्टम को तोड़िये मत, माना सिस्टम में दिक्कत है
लेकिन ये सिस्टम है तो हम सब हैं , वरना आज़ाद तो और भी देश हुए हैं,  कहाँ पहुंचे हैं वो , और वहाँ के नागरिकों को कितनी आज़ादी है